ब्लॉग सीरीज़: “सीमा की आग, प्रेम की प्यास” – भाग 1
शीर्षक: सरहद के उस पार… कामना
"जिसकी मुस्कान में मौत भी घुल जाए, ऐसी थी कामना… और जिस वीर ने उस ज़हर को चख लिया, उसका नाम था अर्जुन।"
रेत के सुनहरे समंदर में जब सूरज झुकता है, तब जैसलमेर की सीमा पर तैनात निगाहें कभी-कभी किसी चेहरे को याद कर बैठती हैं।
वहीं एक वीर था – अर्जुन लाठर, हरियाणा का जाट, भारतीय इंटेलिजेंस का सबसे तेज़ और चालाक जासूस, जो पाकिस्तान की सीमा पार मिशन पर था। उसका गंतव्य था "रिजाउ", पाकिस्तान का वो गांव जो भारत के खिलाफ साजिशों की जमीन बन चुका था।
पर वहां वो सिर्फ बंदूक नहीं ले गया था – अपनी छाती में धड़कता हुआ दिल और आँखों में कुछ भूली हुई इच्छाएँ भी छुपा लाया था।
उधर थी कामना फातिमा, पाकिस्तान आर्मी इंटेलिजेंस की अद्भुत, ख़ूबसूरत लेकिन घातक जासूस। कहा जाता था –
"जिसने भी कामना की आंखों में देखा, वो या तो मरा, या फिर जीना भूल गया।"
कामना का चेहरा गांव के हर नौजवान के ख्वाबों का हिस्सा था। उसकी चाल में लहर थी, और लहरों में डूबने को तैयार अर्जुन एक शाम उस सराय में जा पहुँचा, जहाँ कामना सादे कपड़ों में चाय परोसती थी।
जब पहली बार दोनों की नज़रें मिलीं, तो ज़ुबानें खामोश रहीं लेकिन दिलों की सरहदें लांघ चुकी थीं।
"तुम कौन हो?"
"जो तुम्हारी आंखों में छिपे झूठ को पढ़ रहा है..." अर्जुन ने कहा।
कामना मुस्कुराई – "फिर भी चाय पी लो, ज़हर नहीं है – फिलहाल!"
वो मुलाकातें बढ़ीं। छुप-छुप कर, साँसें मिलाकर, हथेलियाँ छूकर, और एक रात...
रिजाउ की एक वीरान हवेली में, जब दोनों के होंठ काँपे, सांसें तेज़ हुईं, और उंगलियाँ उस नक्शे को छोड़कर एक-दूसरे के जिस्म को पढ़ने लगीं – तो इतिहास थम गया।
कमरा अंधेरे में डूबा था, लेकिन उनके जिस्म की गर्मी जैसे चिंगारी बन रही थी। कामना की ओढ़नी खिसकी, अर्जुन की उंगलियाँ उसकी पीठ के नक्शों पर फिसलीं।
"जब तक होंठ अलग थे, ये सिर्फ जासूसी थी…
जब होंठ मिले, तो साज़िशें पिघल गईं।"
कमरे में सिर्फ दीया जल रहा था, और उनके जिस्म की परछाइयाँ दीवारों पर थिरक रही थीं।
वीर ने धीमे से कामना के कान में कहा –
“ये मिशन नहीं है, ये मैं हूं… और आज तुम सिर्फ कामना नहीं, मेरी ज़रूरत हो।”
कामना की पलकें भीगी थीं –
“तो लो… ये ज़रूरत पूरी कर लो अर्जुन, फिर मुझे मत कहना कि मैंने कुछ छुपाया।”
और फिर... वहाँ न नक्शे थे, न देश… सिर्फ पसीने की गंध, संवेदनाओं की आहट, और इच्छाओं की लहरें थीं।
"क्या ये युद्ध से पहले का शांति समझौता है?" – कामना ने धीरे से पूछा।
"नहीं, ये surrender है… बिना शर्त!" – अर्जुन का स्वर कांप रहा था।
वो रात सिर्फ एक शारीरिक समागम नहीं थी – वो एक भावनात्मक युद्धविराम था। दोनों ने जाना, दुश्मन देश हो सकते हैं, दिल नहीं।
लेकिन... जब सूरज उगा, मिशन की याद आई, रेडियो से आवाज़ आई –
“कामना, तुम्हारा टारगेट पकड़ में आ गया है या नहीं?”
पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी... कामना, वीर अर्जुन का अंश अपने गर्भ में पाल चुकी थी। और उस बच्चे में दो मुल्कों की कहानियाँ धड़क रही थीं।
आगे क्या होगा?
- क्या कामना अपने देश से बगावत करेगी?
- क्या अर्जुन उसे लेकर भारत लौटेगा या देशभक्ति का फ़र्ज़ बीच में आएगा?
- और वो बच्चा… क्या वो दो देशों के बीच "शांति का प्रतीक" बनेगा?
सीरीज़ के अगले भाग में जानिए – जब वफ़ा और वतन आमने-सामने होंगे… तब कौन जीतेगा?


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